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देहरादून। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के पाखरो टाइगर सफारी प्रकरण को अब पांच साल बीत चुके हैं, लेकिन यह मामला आज भी पूरी तरह सुलझ नहीं पाया है। देश के सबसे चर्चित वन्यजीव और पर्यावरणीय विवादों में शामिल इस प्रकरण में कई बड़ी जांच एजेंसियां काम कर चुकी हैं, फिर भी अवैध रूप से काटे गए पेड़ों की वास्तविक संख्या और उनकी बरामदगी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है। शुरुआत में हजारों पेड़ों के कटान का दावा किया गया था, जो समय के साथ घटते-घटते सैकड़ों तक सिमट गया, लेकिन कई सवाल अब भी जस के तस बने हुए हैं।

 

इस पूरे मामले में एक और गंभीर पहलू यह भी सामने आया कि जांच के दौरान कुछ अधिकारियों को फंसाने की साजिश रचे जाने के आरोप भी लगे। सूत्रों के मुताबिक, मामले को एक खास दिशा देने के लिए कुछ तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया में निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हुए। हालांकि, आधिकारिक तौर पर इस तरह के आरोपों की स्पष्ट पुष्टि नहीं हो पाई है, लेकिन यह मुद्दा जांच की पारदर्शिता पर सवाल जरूर खड़ा करता है।

 

दरअसल, अगस्त 2021 में यह मामला पहली बार सुर्खियों में आया था, जब पाखरो टाइगर सफारी परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर पेड़ों के अवैध कटान के आरोप लगे। इसके बाद यह मामला राज्य से निकलकर राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा में आ गया। इसकी गंभीरता को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट, नैनीताल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक ने अलग-अलग स्तर पर जांच के निर्देश दिए।

 

पिछले पांच वर्षों में इस प्रकरण की करीब 12 जांच हो चुकी हैं। इनमें नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA), केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, सेंट्रल जू अथॉरिटी (CZA), फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI), सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी (CEC), राज्य विजिलेंस, सीबीआई, ईडी, कैग और एनजीटी जैसी एजेंसियां शामिल रही हैं। बावजूद इसके, अवैध रूप से काटे गए पेड़ों की सटीक संख्या और उनकी बरामदगी को लेकर स्थिति आज भी अस्पष्ट बनी हुई है।

 

शुरुआत में इस मामले में 10,000 पेड़ों के अवैध कटान का दावा किया गया था, जिसने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया था। बाद में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में यह संख्या घटकर 6093 बताई गई। इसके बाद विभिन्न एजेंसियों की जांच के आधार पर यह आंकड़ा और कम होता गया और अंततः लगभग 819 पेड़ों के संभावित कटान पर आकर टिक गया। हालांकि यह भी पूरी तरह पुष्ट आंकड़ा नहीं है, बल्कि सैटेलाइट इमेजरी और वैज्ञानिक आकलन के आधार पर अनुमानित संख्या है।

 

वहीं, आधिकारिक तौर पर इस परियोजना के लिए 163 पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई थी, लेकिन जांच में 260 पेड़ों के कटान की पुष्टि हुई। इनमें से 41 पेड़ों को वन विकास निगम ने गलती से काटे जाने की बात स्वीकार की थी। खास बात यह रही कि इन 260 पेड़ों की मौके पर बरामदगी भी हो गई थी, लेकिन इससे आगे के कथित बड़े पैमाने के कटान को लेकर कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया।

 

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इतने बड़े स्तर पर जांच होने के बावजूद अवैध रूप से काटे गए पेड़ों को कहां ले जाया गया, किसे बेचा गया या उनकी बरामदगी क्यों नहीं हो पाई—इन सवालों का जवाब आज तक नहीं मिल पाया है। यही कारण है कि यह मामला पांच साल बाद भी रहस्यों में घिरा हुआ है।

 

जांच की लंबी प्रक्रिया में अगस्त 2021 से लेकर 2023 तक लगातार विभिन्न एजेंसियां सक्रिय रहीं। दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर NTCA ने जांच शुरू की, इसके बाद केंद्रीय मंत्रालय और नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश पर राज्य स्तर की समितियों ने जांच की। 2022 में विभागीय जांच समिति, सेंट्रल जू अथॉरिटी और सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी ने भी इस मामले को देखा। बाद में विजिलेंस, FSI और फिर 2023 में सीबीआई, ईडी, कैग और एनजीटी भी जांच में शामिल हो गए।

 

वन मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि इस मामले में पेड़ों के अवैध कटान के आंकड़े को लेकर शुरुआत से ही भ्रम की स्थिति रही है। उनके अनुसार, कई आंकड़े काल्पनिक रूप से प्रस्तुत किए गए, जबकि वास्तविक स्थिति अलग है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल मामला सीबीआई जांच के दायरे में है और अदालत के निर्देशों के अनुसार दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

 

पूर्व वन मंत्री हरक सिंह रावत भी इस परियोजना को कानूनी और सकारात्मक उद्देश्य से जुड़ा बताते रहे हैं। उनका कहना है कि हजारों पेड़ों के अवैध कटान के दावे गलत थे और परियोजना को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से इस तरह की बातें सामने लाई गईं।

 

कुल मिलाकर, पाखरो टाइगर सफारी प्रकरण पांच साल बाद भी कई अनसुलझे सवाल छोड़ता है। जांच एजेंसियों की लंबी सूची और रिपोर्टों के बावजूद न तो कटान की सटीक तस्वीर सामने आ पाई है और न ही जिम्मेदारियों का स्पष्ट निर्धारण हो सका है। ऐसे में यह मामला न केवल वन प्रबंधन प्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि जांच प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी बहस को जन्म देता है।


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