जसपुर। उत्तराखंड के जसपुर क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत करीब 1200 आवास बनकर तैयार होने के बावजूद लाभार्थियों को इनका लाभ नहीं मिल पा रहा है। आवास तैयार होने के बाद भी सैकड़ों लाभार्थी अपने घर का इंतजार कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि इन आवासों को लाभार्थियों को उपलब्ध कराने के लिए बैंक ऋण की व्यवस्था की जानी थी, लेकिन सहकारी और कॉपरेटिव बैंकों की ओर से ऋण देने से इनकार किए जाने के कारण पूरी योजना अधर में लटक गई है।
योजना के तहत जरूरतमंद परिवारों के लिए बनाए गए इन मकानों का निर्माण पूरा हो चुका है। लोगों को उम्मीद थी कि जल्द ही उन्हें अपना पक्का घर मिल जाएगा, लेकिन बैंक स्तर पर ऋण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने से लाभार्थियों की उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। जिन परिवारों को आवास मिलने थे, वे अभी भी अपने पुराने या अस्थायी ठिकानों में रहने को मजबूर हैं।
लाभार्थियों का कहना है कि जब सरकार और संबंधित विभागों की ओर से आवास तैयार कर दिए गए हैं तो उन्हें घर का अधिकार मिलने में बैंक ऋण की अड़चन क्यों आ रही है। इस मामले को लेकर लोगों में लगातार नाराजगी बढ़ रही है। उनका आरोप है कि विभागों के बीच पत्राचार तो लगातार हो रहा है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं निकल पा रहा है।
बताया जा रहा है कि आवास योजना से जुड़े विभागों की ओर से सहकारी एवं कॉपरेटिव बैंकों को पत्र भेजकर लाभार्थियों को ऋण उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है। इसके बावजूद बैंक स्तर पर ऋण स्वीकृत नहीं होने से तैयार मकान खाली पड़े हैं। ऐसे में सरकारी योजना पर खर्च होने के बाद भी उसका वास्तविक लाभ जरूरतमंद परिवारों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये खर्च कर आवास तैयार होने के बावजूद लाभार्थियों को उनका घर कब मिलेगा। यदि बैंक और संबंधित विभागों के बीच समन्वय की कमी के कारण योजना अटक रही है तो इसका खामियाजा आखिरकार गरीब और जरूरतमंद परिवारों को ही भुगतना पड़ रहा है।
मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के गृह जिले से जुड़ा है। ऐसे में लोगों को उम्मीद है कि सरकार इस मामले में जल्द हस्तक्षेप कर बैंक और संबंधित विभागों के बीच बनी गतिरोध की स्थिति को खत्म करेगी।
वहीं, आगामी चुनावी माहौल के बीच प्रधानमंत्री आवास जैसी महत्वपूर्ण योजना का लाभ पात्र लोगों तक नहीं पहुंच पाना सरकार के लिए भी चुनौती बन सकता है। लाभार्थियों में बढ़ता रोष यदि जल्द दूर नहीं हुआ तो यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी तूल पकड़ सकता है। अब निगाहें सरकार और संबंधित विभागों पर हैं कि करीब 1200 तैयार आवासों को लाभार्थियों के हाथों तक पहुंचाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
