पिछले 48 घंटों में गुलदार के हमलों की दो घटनाएं, पांच साल में 96 लोगों की गई जान; जनता में आक्रोश, लेकिन विभाग के मुखिया की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
देहरादून। उत्तराखंड में गुलदार के बढ़ते हमलों ने एक बार फिर पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक लोगों की चिंता बढ़ा दी है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में गुलदार की सक्रियता और हमलों की घटनाओं से ग्रामीणों में दहशत का माहौल है। हालात ऐसे हैं कि कई क्षेत्रों में लोग घरों से बाहर निकलने में भी डर महसूस कर रहे हैं। लगातार सामने आ रही घटनाओं के बीच वन विभाग की कार्यप्रणाली और वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं।
पिछले 48 घंटों के भीतर प्रदेश में गुलदार के हमलों की दो घटनाएं सामने आई हैं। वहीं, उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच वर्षों में गुलदार के हमलों में 96 लोगों की जान जा चुकी है। यह आंकड़ा अपने आप में वन विभाग की चुनौती और वन्यजीव-मानव संघर्ष की गंभीरता को दर्शाता है। इसके बावजूद सवाल यह है कि आखिर इन घटनाओं को रोकने के लिए अब तक कोई प्रभावी और स्थायी रणनीति क्यों सामने नहीं आ पाई है?
गुलदार के हमलों के बाद कई स्थानों पर स्थानीय लोगों का गुस्सा देखने को मिल रहा है। ग्रामीण वन विभाग के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और गुलदार को पकड़ने, प्रभावित क्षेत्रों में पिंजरे लगाने, गश्त बढ़ाने तथा लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं, लोगों का आक्रोश सीधे सरकार और स्थानीय प्रशासन पर दिखाई देता है। सरकार को जनता के सवालों का सामना करना पड़ता है, जबकि वन्यजीवों से जुड़ी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभालने वाले विभागीय अधिकारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ जाती है।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि वन विभाग के मुखिया यानी हॉफ और चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन जैसे महत्वपूर्ण पदों पर बैठे वरिष्ठ अधिकारियों की सार्वजनिक जवाबदेही को लेकर सवाल उठ रहे हैं। मीडिया की ओर से लगातार संपर्क किए जाने के बावजूद दोनों वरिष्ठ अधिकारियों के सामने आकर स्थिति स्पष्ट करने को तैयार नहीं होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब प्रदेश में वन्यजीव हमलों को लेकर इतना गंभीर संकट बना हुआ है, तब विभाग के शीर्ष अधिकारी अपनी रणनीति और कार्रवाई की जानकारी जनता के सामने क्यों नहीं रख रहे हैं?
इसके अलावा गुलदारों की बढ़ती संख्या को लेकर भी विभाग के पास स्पष्ट और अद्यतन आंकड़ों की उपलब्धता पर सवाल हैं। यदि विभाग के पास प्रभावित क्षेत्रों में गुलदारों की वास्तविक संख्या, उनकी गतिविधियों और हमलों के संभावित कारणों का सटीक आकलन नहीं होगा, तो प्रभावी रणनीति तैयार करना भी चुनौतीपूर्ण रहेगा।
जरूरत इस बात की है कि वन विभाग केवल किसी घटना के बाद पिंजरे लगाने और टीम भेजने तक सीमित न रहे, बल्कि संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, नियमित निगरानी, कैमरा ट्रैप, विशेषज्ञों की मदद, त्वरित रेस्क्यू टीम और स्थानीय लोगों को जागरूक करने की ठोस व्यवस्था विकसित करे।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर उत्तराखंड के लोगों को गुलदार के डर के साये में कब तक जीना पड़ेगा? क्या वन विभाग के आला अधिकारी इन घटनाओं की जिम्मेदारी लेते हुए जनता के सामने जवाब देंगे या फिर हर नई घटना के बाद सरकार को ही लोगों के आक्रोश का सामना करना पड़ेगा? अब प्रदेश की जनता को आश्वासनों से ज्यादा जमीन पर दिखाई देने वाली कार्रवाई का इंतजार है।
