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लीज समाप्त होने के बाद भी नहीं सुलझा नजूल भूमि का मामला, मजिस्ट्रेट जांच में नगर पालिका की अनियमितताओं का उल्लेख; शिकायत के बाद निर्माण रोकने और सरकारी बोर्ड लगाने के निर्देश

 

रामनगर (नैनीताल): उत्तराखंड के रामनगर क्षेत्र के भवानीगंज में सरकारी नजूल भूमि को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। लीज की अवधि समाप्त होने के बाद भी भूमि के इस्तेमाल और उसके कथित अवैध हस्तांतरण का मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई तक पहुंच गया है। आरोप है कि नगर पालिका की कथित मिलीभगत से सरकारी जमीन को खुर्द-बुर्द किया गया और अब इसी भूमि पर कब्जे की मंशा से निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया। सवाल यह है कि जब भूमि को लेकर पहले से जांच हो चुकी थी और मामला शासन-प्रशासन के संज्ञान में था, तो आखिर निर्माण की नौबत कैसे आ गई? इस पूरे प्रकरण ने शहरी विकास विभाग की कार्यप्रणाली और सरकारी जमीनों की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

1960 में समाप्त हो गई थी लीज, फिर जमीन का क्या हुआ?

 

शिकायतकर्ता अजय कुमार अग्रवाल के अनुसार, भवानीगंज में स्थित लीज संख्या 155 की नजूल संपत्ति में 916.82 वर्ग गज का भवन और 4 बीघा 15 बिस्वा बाग की भूमि शामिल थी। बताया गया है कि संबंधित लीज वर्ष 1960 में ही कालातीत हो गई थी। इसके बावजूद आरोप है कि बाग की भूमि को कथित तौर पर अवैधानिक तरीके से खुर्द-बुर्द किया गया।

 

यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि लीज समाप्त होने के बाद संबंधित संपत्ति की स्थिति स्पष्ट करने और सरकारी भूमि की सुरक्षा के लिए समय रहते प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए गए? यदि जमीन वास्तव में राज्य सरकार की संपत्ति है, जैसा कि शिकायतकर्ता को नगर पालिका की ओर से बताया गया, तो उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी है।

 

2022 की मजिस्ट्रेट जांच में भी उठे थे सवाल

 

इस मामले में वर्ष 2022 में मजिस्ट्रेट जांच पूरी होने का दावा किया गया है। शिकायतकर्ता के मुताबिक, जांच में नगर पालिका परिषद की ओर से अनियमितताएं बरते जाने का उल्लेख किया गया था। इसके बाद भी विवाद का पूरी तरह समाधान नहीं हो सका।

 

यदि जांच में अनियमितताओं की बात सामने आई थी, तो उसके बाद क्या कार्रवाई हुई? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की गई? क्या जमीन के रिकॉर्ड की समीक्षा कर सरकारी संपत्ति की स्थिति स्पष्ट की गई? इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए। मामले में उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी अधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी या मिलीभगत को अंतिम रूप से स्थापित नहीं माना जा सकता, लेकिन जांच के बाद भी विवाद बने रहना प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े करता है।

 

हाईकोर्ट के आदेश के बाद शासन तक पहुंची शिकायत

 

शिकायतकर्ता ने इस मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजा था। बताया गया है कि अदालत ने पत्र को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया। 5 अगस्त 2026 को सुनवाई के दौरान याचिका खारिज करते हुए अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि यदि सरकारी नियमों या लीज की शर्तों का उल्लंघन हुआ है, तो सरकार नियमानुसार कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है।

 

इसके बाद 11 अगस्त 2026 को अजय कुमार अग्रवाल ने मुख्यमंत्री, शहरी विकास विभाग के कैबिनेट मंत्री, प्रमुख सचिव शहरी विकास, कुमाऊं आयुक्त और नैनीताल के जिलाधिकारी को ईमेल के माध्यम से कार्रवाई का अनुरोध भेजा।

 

बताया गया है कि शासन ने जिलाधिकारी को कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद जिलाधिकारी ने 1 अक्टूबर 2026 को उपजिलाधिकारी रामनगर को आवश्यक कार्रवाई करने के लिए कहा। इसके बावजूद शिकायतकर्ता का आरोप है कि विवादित भूमि पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया।

 

शहरी विकास विभाग की जवाबदेही पर सवाल

 

मामले में शिकायतकर्ता का कहना है कि जब वह नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी से मिले, तो उन्हें बताया गया कि संपत्ति राज्य सरकार की है और कार्रवाई सरकार करेगी। नगर पालिका इस मामले में कार्रवाई नहीं कर सकती।

 

यहीं से शहरी विकास विभाग की भूमिका पर सवाल उठते हैं। यदि नगर पालिका संपत्ति को राज्य सरकार की मानती है, तो संबंधित विभागों के बीच समन्वय कर भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है? शासन के निर्देशों के बाद भी यदि जमीन पर निर्माण होने लगे, तो आदेशों के अनुपालन की निगरानी कौन कर रहा था? सरकारी जमीन पर कब्जे की आशंका के बीच प्रशासनिक स्तर पर स्पष्ट और समयबद्ध कार्रवाई क्यों जरूरी नहीं समझी गई?

 

एसडीएम के निर्देश के बाद निर्माण पर रोक

 

ताजा घटनाक्रम में अजय कुमार अग्रवाल ने उपजिलाधिकारी रामनगर से मुलाकात कर पूरे मामले की जानकारी दी। शिकायतकर्ता के अनुसार, एसडीएम ने नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी को निर्माण कार्य पर रोक लगाने और संबंधित भूमि पर नगर पालिका का बोर्ड लगाने के निर्देश दिए हैं।

 

अब देखना होगा कि इन निर्देशों का जमीन पर कितना असर होता है और कथित अवैध निर्माण पर प्रभावी रोक लगती है या नहीं। साथ ही, वर्ष 2022 की जांच में सामने आई बताई गई अनियमितताओं, लीज की स्थिति और भूमि के कथित हस्तांतरण की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय की जाती है या नहीं।

 

रामनगर का यह मामला केवल एक भूखंड का विवाद नहीं, बल्कि सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा, विभागीय जवाबदेही और प्रशासनिक आदेशों के पालन की परीक्षा भी है। शहरी विकास विभाग और संबंधित अधिकारियों को इन सवालों पर स्पष्ट जवाब देना चाहिए, ताकि सरकारी जमीन को लेकर पारदर्शिता बनी रहे और नियमों के उल्लंघन की स्थिति में निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।

 

नोट: इस खबर में मिलीभगत, अवैध हस्तांतरण और कब्जे से संबंधित बातें शिकायतकर्ता के आरोपों पर आधारित हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित विभागों का पक्ष सामने आना बाकी है।


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