नैनीताल। हल्द्वानी के रामलीला मैदान से जुड़े शुद्धिकरण प्रकरण को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट की कार्यवाही के बाद कांग्रेस के राजनीतिक नैरेटिव पर सवाल खड़े हो गए हैं। कांग्रेस ने इस मामले को दलित सम्मान और जातिगत भेदभाव से जोड़ते हुए उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक जोर-शोर से उठाया था। हालांकि, अब अदालत में हुई सुनवाई के बाद मामले की जांच में हस्तक्षेप से इनकार किए जाने के बाद कांग्रेस के आरोपों के आधार को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।
दरअसल, 8 अगस्त को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने हल्द्वानी के रामलीला मैदान में जनसभा की थी। इसके तीन दिन बाद, 11 अगस्त को इसी मैदान में धार्मिक अनुष्ठान और गंगाजल छिड़कने का मामला सामने आया। कांग्रेस ने इसे ‘शुद्धिकरण’ बताते हुए आरोप लगाया कि यह आयोजन खड़गे की जातिगत पहचान के कारण किया गया और इसे दलित समाज के अपमान से जोड़ दिया।
मामला हल्द्वानी तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस मुद्दे को राज्यसभा में भी उठाया और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की। राहुल गांधी ने भी इस प्रकरण को लेकर सरकार पर निशाना साधा। इसके चलते स्थानीय विवाद राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया।
इसके बाद देहरादून निवासी बैजनाथ की ओर से नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। याचिका में मामले से जुड़े वीडियो, सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के साथ प्रभावी कार्रवाई की मांग की गई थी। 7 सितंबर को सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत के समक्ष जांच और दर्ज एफआईआर की स्थिति रखी। सरकार की ओर से मामले से संबंधित वीडियो साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का भरोसा भी दिया गया।
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को निस्तारित करते हुए पुलिस जांच में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने अब तक की पुलिस कार्रवाई पर भी संतोष जताया। इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस के उन आरोपों पर सवाल उठाए हैं, जिनमें पूरे प्रकरण को सीधे जातिगत भेदभाव और दलित अपमान से जोड़ा गया था।
भाजपा का सवाल है कि कांग्रेस के पास ऐसा कौन-सा वीडियो, बयान, दस्तावेज या प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिससे यह साबित होता हो कि धार्मिक आयोजन केवल मल्लिकार्जुन खड़गे की जातिगत पहचान के कारण किया गया था। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी पहले स्पष्ट कर चुके हैं कि इस धार्मिक आयोजन से राज्य सरकार या भाजपा का कोई संबंध नहीं है।
इस बीच भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा ने प्रदेशभर में ‘सामाजिक सौहार्द संकल्प धरना’ आयोजित किया। देहरादून, अल्मोड़ा, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, नैनीताल, हल्द्वानी, पिथौरागढ़, टिहरी, चमोली और उत्तरकाशी समेत कई स्थानों पर कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर दलित समाज के नाम पर राजनीति करने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाया।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह विवाद उत्तराखंड की राजनीति में महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस इस प्रकरण के जरिए जातिगत ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है। वहीं कांग्रेस अपने आरोपों को राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बता रही है। हाईकोर्ट की कार्यवाही के बाद अब बहस का केंद्र यही सवाल है कि जातिगत अपमान के दावे को साबित करने के लिए कांग्रेस के पास ठोस प्रमाण क्या हैं।
