उत्तराखंड की राजनीति में बीते दो वर्षों से एक अजीब सा पैटर्न उभरकर सामने आया है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार को लगातार किसी न किसी मुद्दे को लेकर घेरने की कोशिशें होती रही हैं। कभी सड़क पर आंदोलन, कभी सोशल मीडिया पर नैरेटिव और कभी संवेदनशील मामलों को राजनीतिक औजार बनाकर सरकार की छवि पर प्रहार किया जा रहा है। हालिया घटनाक्रम में एक पुराने आपराधिक मामले को फिर से केंद्र में लाकर सरकार को कटघरे में खड़ा करने की कोशिशों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिस मामले को लेकर आज फिर से शोर मचाया जा रहा है, उसमें न्यायिक प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। दोषियों को सजा मिल चुकी है और सरकार की ओर से उस समय सख्त और त्वरित कार्रवाई की गई थी। इसके बावजूद, बार-बार उसी विषय को उछालना यह संकेत देता है कि मामला न्याय का नहीं, बल्कि राजनीति का अधिक है। खासतौर पर तब, जब प्रदेश धीरे-धीरे चुनावी वर्ष की ओर बढ़ रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यह दबाव केवल विपक्षी मोर्चे से ही नहीं आ रहा। सत्ता पक्ष के भीतर भी कुछ असंतुष्ट स्वर हैं, जो खुले मंच पर न सही, लेकिन परोक्ष रूप से सरकार को कमजोर करने की कोशिशों में शामिल बताए जा रहे हैं। सरकार की सख्त प्रशासनिक शैली, निर्णयों में केंद्रीय नेतृत्व से सीधे संवाद और कई पुराने शक्ति केंद्रों को दरकिनार किए जाने से भीतरखाने नाराजगी पनपने की बात कही जा रही है।
इन नाराज तत्वों पर आरोप है कि वे जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों को हवा देकर सरकार को रक्षात्मक स्थिति में लाने का प्रयास कर रहे हैं। आंदोलनों का समय, मुद्दों का चयन और अचानक सक्रियता इस संदेह को और गहरा करता है। सवाल यह भी है कि क्या यह सब महज संयोग है या फिर किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा।
सरकार की ओर से साफ संकेत दिए गए हैं कि प्रदेश में स्थिरता भंग करने की कोशिशों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह भी कहा गया है कि जनता अब सच और साजिश के फर्क को समझने लगी है। आने वाले समय में यह साफ हो जाएगा कि ये प्रयास जनहित में हैं या किसी खास राजनीतिक एजेंडे को साधने के लिए।
फिलहाल, उत्तराखंड की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां असली लड़ाई सड़क पर नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर और रणनीति के स्तर पर लड़ी जा रही है। जनता की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कौन विकास के साथ खड़ा है और कौन अस्थिरता के बीज बो रहा है।
